Sunday, 17 May 2009

चलो चलते हैं...


आओ...

चलो चलते हैं।

फिर से

उसी नदी के किनारे,

जहां बुने थे

हमने

अपने लिए कुछ सपने।

वो सपने

जो नहीं हुए पूरे,

शायद

होने भी नहीं थे।

मैं फेंकता था

पत्थर

और

कहता था तुम्हें...

वो देखो...

मैं दिखाता था

तुम्हें

पानी में बनते वलय

और

तुम देखा करती थी

उनका गुम हो जाना...।

Saturday, 9 May 2009

ये राहुल तो बड़े सयाने हैं...


राहुल का पंजाब दौरा उनके सियासी समझ की शार्पनेस दिखाता है। भारतीय राजनीति में गांधी परिवार की आलोचना करने और राहुल को बच्चा बताकर खारिज करने वालों को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। इस चुनाव में राहुल ने जिस अंदाज और जिस तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज की है उससे यह तो तय है कि अगला चुनाव राहुल के नाम पर ही होगा। राजनीति की डगर पर उनके कदम का अंदाज इस बात को मजबूती प्रदान करता है।

पंजाब में राहुल ने सिख प्रधानमंत्री के नाम पर खूब राजनीति की। पंजाबियों को इसी मुद्दे पर अपने साथ लाने की कोशिश की। उन्होंने मनमोहन सिंह को शेर-ए-पंजाब बताया और कहा कि यह एक सिख नेतृत्व की बात है। जनता इस बात पर उनका साथ दे कि दो प्रतिशत आबादी का नेतृत्व कर रहे एक सिख को उन्होंने अपना नेता माना है- देश का नेता माना है। यह सिखों के जज्बे की बात है। मनमोहन को कमजोर बताने वाले आडवाणी पर भी उन्होंने खूब हमले किए। कहा, ये मजबूत लोग कहां थे जब संसद पर हमला हुआ? ये मजबूत लोग कहां थे जब कंधार में आतंकियों को छोड़ा जा रहा था। इसके बाद फिर वे मनमोहन और सिख की बात करने लगे। कहा, मैं पूरे देश में घूमा हूं। मुझे कहीं भी कोई कमजोर सिख नजर नहीं आया। मनमोहन के दहाड़ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसी के आगे मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े और सहयोग करना पड़ा। इतना ही नहीं, सिख कौम की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि देश पर जब भी संकट आया है इस कौम ने कुर्बानी देकर देश को बचाया है। ...देखिए राहुल का सियासी सयानापन।

जब राहुल लुधियाना पहुंचे तो उन्हें पंजाब के अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश वासियों की भी याद आ गई। ध्यान दें कि लुधियाना में इन दोनों प्रांतों के लोगों के करीब पौने दो लाख वोट हैं। यहां राहुल ने कहा, कांग्रेस के खिलाफ प्रचार में जुटी एनडीए की सहयोगी पार्टियां महाराष्ट्र में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों पर अत्याचार कर रही है। इस तरह के तत्वों को जवाब दिया जाना जरूरी है। तो देखा आपने... राहुल के अंदाज को?

इतना तो स्पष्ट है कि राहुल इस देश में सत्ता पर कब्जा करने के फंडों की खूब समझ रखते हैं। तभी तो उन्हें सिखों से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश तक की याद चुनावी मंच से आ रही है। अब उन्हें बच्चा बताकर खारिज करने का वक्त इतिहास की बात हो गई।

(फोटोः पीटीआई से साभार)

Wednesday, 6 May 2009

खुशवंत सिंह का सामाजिक सरोकार


जब मैं छोटा था और पत्रकारिता में आने की सोच रहा था तो कुछ खास बड़े नामों को लगातार पढ़ता था। कुछ लोग मुझे तब भी पढ़कर समझ में नहीं आते थे। उस वक्त मुझे लगता था कि इन लोगों के लेखन के स्तर का शायद मैं हूं ही नहीं इसीलिए मेरी समझ में नहीं आता है। जब बड़ा हो जाऊंगा तो खुद ही समझने लगूंगा। अब मैं बड़ा हो गया हूं। पत्रकारिता के प्रोफेशन में भी हूं पर मुझे आज भी वे लोग समझ में नहीं आते। इसी बहाने जिक्र करना चाहूंगा महान पत्रकार खुशवंत सिंह का। उनके लेखन में सेक्स और दारू के असामयिक और बेमौसम जिक्र के सामाजिक आस्पेक्ट पर मैं हर बार सोचता हूं पर मेरी समझ में नहीं आता। मैं सोचता हूं इसीलिए कि किसी बड़े नाम को इतनी आसानी से खारिज भी तो नहीं किया जा सकता। समाज का एक बड़ा तबका उन्हें समझता है (शायद) और सम्मान देता है। मुझे एक बार फिर लगने लगता है कि मुझमें ही कुछ कमी है, शायद कि मेरी समझ ही छोटी है।
खुशवंत सिंह को पढ़ता हूं तो मेरी छोटी मानसिकता में यही समझ आता है कि सेक्स से समाज की हर समस्या का समाधान है। अगर कोई सेक्स को इंज्वाय कर ले तो वह समाज के लिए सार्थक हो जाएगा। उसके जीवन में कुछ इस तरह का घटित हो जाएगा कि रातों रात उसका अपने मूल्यों से परिचय हो जाएगा और वह दुनिया को बहुत कुछ देने लायक बन जाएगा। उसे इस दुनिया में आने का उद्देश्य पता लग जाएगा। ...आपको बात अटपटी लग रही होगी क्योंकि मैं लिख रहा हूं, है न? जी नहीं, ये विचार हैं महान पत्रकार खुशवंत सिंह के ।
पिछले दिनों उन्होंने अपने एक कालम में लिखा कि साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, प्रग्या ठाकुर और मायाबेन कोडनानी जहर उगलती हैं। आगे उन्होंने लिखा है कि, ये चारों देवियां जहर उगलती हैं और मेरा मानना है कि ये सब सेक्स से जुड़ा है। उसे लेकर जो कुंठाएं होती हैं, उससे सब बदल जाता है। अगर इन देवियों ने सहज जिंदगी जी होती तो उनका जहर कहीं और निकल गया होता। अपनी कुंठाओं को निकालने के लिए सेक्स से बेहतर कुछ भी नहीं है।... क्या अजीब सा दर्शन है न?
खुशवंत सिंह के लेख के सामाजिक आयाम को मैं तलाशता रहता हूं पर ज्यादा वक्त मेरे हाथ खाली होते हैं। मैं समझ ही नहीं पाता हूं कि उनके लिखने का और उसे छापे जाने का क्या अर्थ है। अब यहां इन महिलाओं का जिक्र क्यों किया और वे क्या कहना चाहते हैं, मेरी तो समझ में नहीं आया। इसके बाद जवाब में उमा भारती ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए खुशवंत जी ने अपने अंदाज में एक और लेख लिखा। इस लेख में वे लिखते हैं- उमा ने मुझे औरतों के खिलाफ साबित किया है। काश... यह सच होता। मैं तो औरतों को चाहने के चक्कर में बदनाम हूं। मुझे पूरा यकीन है कि अगर मैं उनके आसपास होता तो उन्होंने मुझे थप्पड़ रसीद दिया होता। जैसा उन्होंने एक समर्थक के साथ किया था। बाद में गुस्सा उतरने पर मुझे किस भी किया होता।... ये कैसी सोच है खुशवंत की?
अब जरा सोचिए कि जिन महिलाओं का जिक्र उन्होंने किया है और उस मामले में उन्होंने जो समाधान बताया है... क्या आप उसे तार्किक मानते हैं? क्या सेक्स में डूबकर समाज में मधुरता घुल जाएगी? समाज की सारी कटुता और कुंठा खत्म हो जाएगी? अगर उमा ने खुशवंत जी के बेहूदे सोच पर उन्हें थप्पड़ लगा दिया होता तो कौन सी राष्ट्रीय आपदा पैदा हो जाती? क्या फर्क पड़ता है इससे कि खुशवंत औरतों के चक्कर में बदनाम हैं? क्या आपको उमा भारती से खुशवंत सिंह के किस के एक्सपेक्टेशन में कुछ सार्थक नजर नजर आता है? इस महान पत्रकार की सामाजिक सोच क्या है? उसके लेखन की सार्थकता क्या है? मुझे उम्मीद है कि जिस साथी को ये सब समझ आए वो मेरा मार्गदर्शन जरूर करेंगे।

Sunday, 3 May 2009

याद आते हैं बाबा नागार्जुन


मौसम चुनाव का है। इस मौसम में बाबा नागार्जुन बरबस ही याद आ जाते हैं। इस बीमार व्यवस्था पर उन्होंने अपनी लेखनी से खूब प्रहार किए थे। अपनी एक कविता में उन्होंने राजनेताओं को खूब नसीहत दी है। सच न बोलना... शीर्षक से इस कविता के कुछ अंश नीचे दिए जा रहे हैं...

सच न बोलना


छुट्टा घूमें डाकू-गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,

देखो हंटर भांज रहे हैं जस के तस जालिम सारे।

जो कोई इनके खिलाफ अंगुली उठाएगा, बोलेगा,

काल कोठरी में जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा।

माताओं, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं,

बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं।

मारपीट है, लूटपाट है, तहस-नहस बर्बादी है,

जोर-जुलम है, जेल सेल है- वाह खूब आजादी है।

रोजी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,

कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा।

नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ करेंगे कभी नहीं,

जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं।

सपने में भी सच न बोलना, वरना पकड़े जाओगे,

भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचे, मेवा-मिसरी पाओगे।

माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजदूर-किसानों का,

हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का।

Thursday, 30 April 2009

नेता जी की उम्र कितनी?

एक मित्र ने एक सवाल पूछा। उन्होंने पूछाः- नेता जी की उम्र कितनी होती है? मैं उसके सवाल को समझ न सका। उसने समझाते हुए इसका जवाब दिया और कहाः- जब एक नेता मरता है तो वह उसके तीस साल बाद तक कम से कम जिंदा रहता है। मैंने सवाल कियाः- वो कैसे? मित्र ने आगे समझाया, देखो... एक तो वह खुद सत्ता का सुख भोगता है और उसके बाद कम से कम दो पीढ़ी तो इस सुख को भोगती ही है। उसकी तीसरी पीढ़ी भी अपने दादा के नाम पर टिकट पर अपना हक जताती है। इस तरह से एक नेता अपनी मौत के तीस साल बाद तक कम से कम जिंदा रहता है।

Thursday, 23 April 2009

एक हैं ओझा जी


अगर आपका वास्ता ओझा जी से पड़ जाए तो आप उन कुछ खुशनसीब लोगों में शामिल हो जाएंगे जो शायद हंसी के खजाने का रास्ता जानते हैं। मेरा वास्ता ओझा जी से पड़ा है। जो कह रहा हूं वह अल्प समय में उनके साथ रहने का अनुभव है- एक बिंदास इंसान।रिश्ता उनका भी खबरों की दुनिया से ही है और हमारी मुलाकात भी प्रोफेशनल लाइफ के एक मोड़ पर ही हुई थी। आजकल वे आई-नेक्सट अखबार, लखनऊ में जिम्मेदार पद पर कार्यरत हैं।बात उन दिनों की है जब राजीव ओझा जी अमर उजाला चंडीगढ़ से जुड़े हुए थे। दैनिक जागरण में करीब सात साल काम करने के बाद मैं भी अमर उजाला की चंडीगढ़ यूनिट से जुड़ गया था। मैं दफ्तर में नया-नया था। हर तरफ केबिन में संपादकीय विभाग के वरिष्ठ लोग बैठे थे। इनमें से एक केबिन में ओझा जी भी विराजमान थे। दूर से देखने में काफी गंभीर लगते थे। कान में कंप्यूटर से जुड़ा चोंगा (हेड फोन) लगाए रहते थे। उस वक्त मेरा ज्यादा लोगों से परिचय नहीं था सो मैंने सोचा कि सबसे वरिष्ठ और समझदार अधिकारी शायद यही हैं। मैंने इस तरह की बात इसीलिए सोची क्योंकि उनके कान में चोंगा रहता था जो औरों के कान में नहीं था। बाद में जब ओझा जी से दोस्ताना संबंध कायम हो गया तो मैंने एक दिन उन्हें यह किस्सा सुना दिया। वे खूब हंसे और बोल पड़े, क्यों महाराज... मैं समझदार नहीं हूं क्या? यही अंदाज ओझा जी को खास बना देता है। भीड़ से अलग खड़ा कर देता है।जब मैं चंडीगढ़ में नया-नया था और ओझा जी के गैंग में शामिल हो गया तो रोज घड़ी देखकर बारह बजे उनका फोन आ जाता। वे कभी फोन पर कभी मुझे हेलो नहीं कहते थे। कहते थे- कि करय छियै?। मतलब- क्या कर रहे हैं। मैं बिहार का मैथिल ब्राह्मण हूं। मैथिली के राज से परदा हटाते हुए ओझा जी ने बताया कि छात्र जीवन या शायद शुरूआती व्यावसायिक जीवन में उनका कोई मैथिल मित्र था जिससे उन्होंने मैथिली सीखी थी। जहां तक मैं समझ सका कि मैथिली के नाम पर उनकी कुल जमा पूंजी- कि करय छियै? ही थी। पर किसी के दिल पर दस्तक देने का ओझा जी का अंदाज देखिए। आज भी हमारी बात मैथिली से ही शुरु होकर हिंदी तक पहुंचती है। बहुत दिन तक अगर हमारी बात न हुई हो तो मैं एक मैसेज करता हूं। लिखता हूं- कि करय छियै?। उधर से उनका फोन आता है और पहले तो आधे मिनट खूब हंसते हैं। फिर बात होती है।हां, तो बात हो रही थी बारह बजे ओझा जी के आने वाले फोन की। उनके फोन के बाद मैं तत्काल आफिस पहुंच जाता था। इसके बाद हम निकल पड़ते किसी गली- किसी मोड़ पर चाय पीने। इसी दौरान देश-समाज की बात होती रहती। कई बार हम अनजाने रास्तों पर भी निकल पड़ते थे। एक बार हम मोरनी जा रहे थे। रास्ता पहाड़ वाला सर्पीला था। वे मेरी मोटरसाइकिल के पीछे बैठे थे। रास्ते में अगल-बगल बंदरों का झुंड मिल जाया करता था। वे जब भी किसी बंदर को देखते तो बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह उसे छेड़ दिया करते थे। मुझे डर भी लग रहा था कि कहीं अगर बंदरों ने झपट्टा मार दिया तो? ओझा जी ने मुझसे पूछा, क्यों महाराज डरते हैं का? हमने कहा, अगर बंदरों के झुंड ने हमला कर दिया तो? अब ओझा जी भी हमसे सहमत हो गए थे। कहा, हां महाराज ई तो ठीक्के कहते हैं।भावनाओं पर भी भूगोल हावी हो जाता है जनाब...। काश... लखनऊ पास होता।

Tuesday, 21 April 2009

हमारे जीवन का पारसमणि

कई बार जब आप अपने जीवन को गौर से देखेंगे तो बड़े अजीब से अनुभवों के रास्ते से गुजर रहे होंगे। जब आप अपनी यात्रा और उपलब्धियों का हिसाब-किताब करेंगे तो शायद आप बेचैन हो जाएं। इस तरह की बात जीवन के पारसमणि से दूर रहने की वजह से होती है। यह बेचैनी पारसमणि को न पा सकने की सोच के कोख से पैदा होती है। बस कई बार शायद पर्याप्त उद्यम के अभाव में हम चूक जाते हैं।
पाओलो कोएलो की लिखित पुस्तक अलकेमिस्ट में बड़े सुंदर तरीके से यह बात समझाई गई है। इस पुस्तक में मेल्विजेडेक नाम का एक पात्र है।
सेंटियागो नाम के गड़ेरिये से संवाद के क्रम में वह एक कहानी सुनाता हैः- अभी पिछले हफ्ते मुझे एक खान मजदूर के सामने जाना पड़ा, एक पत्थर के रूप में। वह मजदूर अपना सब कुछ छोड़कर पारसमणि जैसे रत्न की खोज में निकल पड़ा था। पूरे पांच साल तक उसने पत्थरों को खोदा, उलट-पलटकर देखा, मगर उसे रत्न नहीं मिला। तब एक वक्त आया कि उसने पारसमणि की तलाश छोड़ देने का इरादा लिया। और वह भी उस समय जब वह मात्र एक पत्थर को उठाकर देखता तो उसे बेशकीमती रत्न मिल जाता। बेहद करीब आकर उसका धैर्य जवाब दे गया। चूंकि वह मजदूर अपना सब कुछ त्याग करके आया था सो मैंने एक पत्थर का रूप धारण किया और लुढ़कता हुआ उसके पैरों से जा टकराया। वह मजदूर विफलता से परेशान हो चुका था सो उसने उस पत्थर को उठाया और दूर फेंक दिया। एक अन्य पत्थर से टकराकर वह टूट गया और बीच से निकला दुनिया का सबसे खूबसूरत रत्न- पारसमणि।
इस कहानी का जिक्र सिर्फ इसलिए कि हम सबके जीवन में पाससमणि है। जीवन की सार्थकता, उसकी पूर्णता... पासमणि से ही है। जीवन का उद्देश्य पारसमणि को पाना ही है। यात्रा चलती रहनी चाहिए। थकना नहीं हैः- पारसमणि जो पाना है। चरैवेति... चरैवेति...।