एक बार फिर से वरुण गांधी के नाम पर सियासत तेज हो गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने सीधी बात कह दी है। उन्होंने सीधे तौर पर पार्टी की हार के लिए वरुण गांधी को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं मेनका गांधी ने अपने पुत्र के पाले में खड़े होकर कह दिया है कि उनके बेटे के माथे पर हार का ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं है। इसी बीच हैदराबाद के लैब से फारेंसिक रिपोर्ट भी आ गई है। यह साबित हो गया है कि भड़काऊ भाषण देने का दोष वरुण पर है। सीडी असली है, कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। और उसमें आवाज असली वरुण की ही है।
अब थोड़ा पीछे चलते हैं। आठ मार्च को पीलिभीत में वरुण गाँधी ने एक समुदाय विशेष के खिलाफ अपनानजनक और भड़काऊ बात की। हंगामा हुआ। चुनाव आयोग ने मामले में अपनी सलाह दी। भाजपा से कहा गया कि वरुण को प्रत्याशी न बनाया जाए। अभी भाजपा मामले का विश्लेषण कर रही थी। तत्काल उसने इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं की। एक ओर कट्टर हिंदुत्व की बात थी और दूसरी तरफ भाजपा का बदला हुआ चेहरा। यह वह चेहरा था जो विकास की बात ज्यादा करता था। पार्टी के रणनीतिकार चूक कर गए। उन्होंने आयोग की सलाह को दरकिनार करते हुए वरुण के साथ खड़े होने का फैसला किया।
सियासत के गलियारे की खबर रखने वालों को भी शायद ही भाजपा के इतने निराशाजनक प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। सो, यह माना जाने लगा कि अचानक आकाश में चमका यह युवा सितारा भाजपा का भविष्य है। भाजपा में इस तरह के उत्साही लोगों को माथे पर बिठा लेने की परंपरा रही है। यह सच है कि अगर नतीजों ने भाजपा के रीढ़ की हड्डी न तोड़ दी होती तो वरुण टीवी स्क्रीन से लेकर अखबारों तक में चमकते रहते।
भाजपा से दो चूक हुई। एक तो उसने वरुण के मामले में आयोग की सलाह नहीं मानी और दूसरी प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह पर गैरजरूरी हमले किए। जनता इसे पचा न सकी और वह भाजपा के साथ नहीं रही। अगर भाजपा तभी आयोग की सलाह मान लेती तो देश भर में एक सकारात्मक संदेश जाता और नतीजे शायद इस तरह के नहीं होते। लेकिन शायद भाजपा की रणनीति बनाने वालों को लगा होगा कि वरुण तो राममंदिर जैसा जादू करने का माद्दा रखते हैं। बहरहाल चूक के बाद भाजपा में मंथन और सिरफुटव्वल का दौर अभी जारी है।
Sunday, 21 June 2009
Wednesday, 17 June 2009
अखबार में कहीं जगह है?

अचानक ही करीब दस साल पुराना एक किस्सा याद आ गया। मैं उन दिनों अमृतसर शहर में अपने अखबार के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। अखबार उन दिनों पंजाब में नया था इसीलिए ज्यादा से ज्यादा खबर कवर करने को कहा गया था। इसका उद्देश्य यह था कि हम अपने अखबार से ज्यादा से ज्यादा संगठन और लोगों को जोड़ सकें। ज्यादा से ज्यादा खबर और ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें हमारी कोशिश रहती थी।
पंजाब में सामाजिक संगठनों की भरमार है। हर दिन टेबुल पर प्रेस नोट का पुलिंदा पड़ा रहता था। अपनी खास खबरों और रूटीन की खबरों को निपटाने के बाद बारी होती थी प्रेस नोट की। एक ही फाइल में डेस्क के निर्देश के मुताबिक प्रेस नोट को निपटा दिया करता था। हर प्रेस नोट पर आधारित चार-पांच लाइनों की छोटी-छोटी खबरें बनाकर भेज देता था। ये खबरें सामान्यतः एक नजर में या फिलर के रूप में अपनी हैसियत के मुताबिक स्थान पा लेती थीं।
एक सामान्य रिपोर्टर की तरह मैं सुबह को आंख मलता हुआ दरवाजे तक जाता था। वहां पड़ा अखबार का बंडल लेकर बेड तक आता था और अपनी बाईलाइन या खास स्टोरी का डिस्प्ले देखकर नींद की अगली किस्त पूरी करने की कोशिश करता था। अगर खबरों को बेहतर डिस्प्ले मिलता था तब भी मारे खुशी के चैन की नींद नहीं आती थी और अगर खबरों की हत्या (?) हो जाती थी तब तो नींद का सवाल ही नहीं था।
बहरहाल सुबह से ही स्थानीय नेताओं और संगठन के उन लोगों के फोन आने लगते थे जो प्रेस नोट देकर गए थे। वे पूछते थे, भाई साहब, हमारी खबर नहीं लगी। खास खबरों के अलावा अब इन छोटी-छोटी खबरों को देख पाना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता था। कई बार मैं बिना देखे ही उनसे कहता था, अरे... गौर से देखिए जरूर लगी होगी। वे देखने के बाद फिर मुझसे कहते, सर, नहीं लगी है। इसके बाद मैं मामला समझ जाता कि डेस्क के स्पेस मैनेजमेंट की वजह से हो सकता है कि खबर न लगी हो। इसके बाद मैं शिकायत करने वाले सज्जन से पूछता था, अखबार में कहीं खाली जगह है? वो थोड़ी देर अखबार देखकर और सोचकर कहा करते थे- नहीं। इसके बाद मैं तुरंत उनसे कहा करता था, अरे साहब... जब अखबार में जगह ही नहीं है तो खबर लगती कहां? जगह खत्म हो गई होगी सो नहीं लग पाई होगी- आज लग जाएगी।
पत्रकारिता से जुड़े लोग तो इस प्रैक्टिकल प्राब्लेम और डेस्क की सीमाओं को समझते हैं पर वे संगठन वाले बड़ी शिद्दत से मेरे पूछने पर अखबार में खाली जगह खोजने लगते थे।
Monday, 15 June 2009
रंग तो थोड़ा भी बहुत होता है

इस तस्वीर को देखा आपने? पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तसवीर है। गूगल पर विचरण कर रहा था तो कहीं दिख गई। थोड़े से रंगों के समावेश से यह खास बन गई है। इतनी खास कि आपके चेहरे पर हंसी ले आई है। है न?
जीवन की सुंदरता रंग से है। महसूस करने पर है कि हम किस पहलू को किस नजरिए से देखते हैं। तमाम दर्द के बीच कुछ खुशी तलाशनी चाहिए। कुछ रंग जो बिल्कुल इस तसवीर जैसा इफैक्ट ला दे।
Sunday, 14 June 2009
बाल ठाकरे का दोगलापन

बात समझ में नहीं आयी। शिवसेना प्रमुख को राष्ट्र की चिंता हो रही है। उन्हें दर्द हो रहा है कि आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों को पीटा जा रहा है। वे चाहते हैं कि आईपीएल में आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को खेलने से रोका जाए।
यह उस बाल ठाकरे का दर्द है जिनके इशारे पर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को महाराष्ट्र में जानवरों की तरह पीटा जाता है। इन्हीं के नक्शे कदम पर उनके भतीजे राज ठाकरे भी चल रहे हैं। इसे ठाकरे का दोगलापन न कहें तो और क्या कहें।
जरा गौर से देखिए तो आस्ट्रेलिया में नस्लीय भेद विवाद का मूल है। महाराष्ट्र में भाषाई और इलाका विशेष को लेकर जहर फैलाया जा रहा है। फैला कौन कहा है? कौन है जो इन मुद्दों की दुकानदारी कर रहा है। चाचा और भतीजे में इस बात को लेकर होड़ मची रहती है कि इस बार बाहरी राज्य के छात्रों को किसने शिकार बनाया। ये कैसी सोच है?
अगर बात राजनेताओं तक सीमित रह जाए तो और बात है पर यह सब समाज में गहराई तक फैलता जा रहा है। बुद्धिजीवी तबका भी इससे वंचित नहीं है। पिछले दिनों पुणे ला इंस्टीट्यूट के लिए इंटरव्यू देने को बिहार के विद्यार्थी महाराष्ट्र पहुंचे थे। उनसे इंटरव्यू बोर्ड में शामिल लोगों ने बेहुदे सवाल पूछे। पूछा गयाः- क्या आप इस बात से सहमत हैं कि बिहार देश का क्राइम कैपिटल है? आगे पूछा गयाः- क्या बिहार के लोग अपराध को अंजाम देने के मकसद से यहां नहीं आते? बात यहीं खत्म नहीं हुई। आगे पूछा गयाः- क्या बिहार के बारे में राज ठाकरे की मानसिकता से आप सहमत हैं? ये कौन से सवाल हैं? इन सवालों की सार्थकता क्या है? औचित्य क्या है?
बिहारियों ने तो पूरी दुनिया में परचम लहराया है। क्या हर जगह वे अपराध को अंजाम देने जाते हैं? अगर इस तरह की बात है तो पूरी पुलिस फोर्स को बिहार में लगा देना चाहिए। देश के अन्य हिस्सों में इसकी जरूरत ही क्या? महाराष्ट्र में तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। क्यों? क्या इंटरव्यू लेने वाले कुंठित और घटिया मानसिकता वाले सज्जन इन बातों का जवाब दे पाएंगे?
अगर बात टपोरी टाइप के राज ठाकरे और बाल ठाकरे जैसे लोगों की हो तो चिंताजनक नहीं है पर अगर बौद्धिक समाज को यह रोग लगता जा रहा है तो यह ठीक भविष्य का संकेत नहीं है। राष्ट्र और समाज की बात ठाकरे जैसे लोग अगर न करें तो बेहतर है। मैं यह भी नहीं समझ पाता कि ये लोग मराठी मामलों की भी दुकानदारी कैसे कर लेते हैं? मुंबई में हमला हुआ। दुनिया सिहर उठी। ये तथाकथित मराठी अस्मिता के ठेकेदार कहीं नजर नहीं आ रहे थे। सड़क पर गुंडों की फौज को दौड़ाने से देश नहीं चलता- समाज नहीं बनता। इस तरह के लोगों को सड़क पर दौड़ाकर पीटा जाना चाहिए- उन्हीं के अंदाज में।
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